ये घटना सितम्बर 2003 के नाशिक कुम्भ मेला के समय की है, हमारी समिति के तरफ से हम श्री सुरेशानंद जी का सत्संग मांगने बापूजी के पास पहुँचे, गुरुजी सत्संग की अनुमति प्रदान करते हुए बोले कि आगे की चर्चा सुरेश से मिलकर करलो।
सत्संग प्रोग्राम की व्यवस्था फाइनल करने के लिए लगभग हमारी बात रोज बापूजी एवं श्रीसुरेशानंद जी से अलग अलग 3/4 दिनों तक होती रही और अंत में बापूजी की मुहर लगनी थी इसके लिए हम बापूजी से मिलने नाशिक आश्रम रात को करीब 10 बजे पहुंचे, गुरुजी सांयकालीन भ्रमण के लिए निकले थे।
हमने देखा कि बापूजी से मिलने के लिए कुछ 15/17 साधक भाई बहन आश्रम के गेट पर ही प्रतीक्षा में खड़े हैं, तो हम भी वहीं खड़े हो गए।
थोड़ी देर में बापूजी आए एवं टॉर्च जलाकर सबके चेहरे पर देखे और सबका समाचार/कुशलता पूछने लगे। तभी एक भाई ने बताया कि बापूजी 3/4 महीने पहले ऋषि प्रसाद में मनोकामना पूर्ति का मंत्र छपा था।
बापूजी बोले कि "हाँ छपा था मैंने ही छपवाया था उसका अनुष्ठान करो अगर कोई मनोकामना होगी तो पूर्ण होगी।"
वो भाई बोले कि बापूजी मैने उसका अनुष्ठान किया।
बापूजी बोले "क्या हुआ ? मनोकामना पूर्ण हुई?"
वो भाई बोले जी गुरुदेव पूरी हो गई।
इस पर बापूजी पूछे कि मनोकामना क्या थी बताओ
तो वे भाई रोते हुए बोले कि मैंने कई वर्षों से काफी प्रयास किया कि गुरुजी का दर्शन अच्छे से नजदीक से हो, पर कभी नही हुआ। कई बार अहमदाबाद और सूरत के शिविरों में गया और भी कई जगह गया लेकिन मुझे कहीं भी नजदीक से बढ़िया दर्शन नही हुआ। इसलिए ऋषि प्रसाद में मन्त्र देखा तो अनुष्ठान किया और आज इतना बढ़िया दर्शन हुए।
इतना सुनते ही बापूजी ने टॉर्च की रोशनी अपने स्वयं की ओर करके विनोदी अंदाज़ में बोले कि ले और अच्छे से जी भर के दर्शन कर ले।
वो भाई इतने भावुक हो गए कि खड़े नही रह पाए वहीं भूमि पर बैठकर रोने लगे और गुरुदेव बोले कि मैं यही हूँ तुम शान्ति से रो लो मन हल्का हो जाएगा।
उसके बाद बापूजी वहाँ खड़े सबसे बोले कि देखो इसने अनुष्ठान किया उसका फल इसे मिल गया, दर्शन की इच्छा थी पूरी हो गई, अब अनुष्ठान की जो कमाई थी वो खत्म हो गई उसका फल दर्शन मिलने से
अब इसके पास दर्शन का पुण्य रहेगा।
बापूजी ने स्पष्ट समझाए की आप पैसा कमाते हो उस कमाई से कोई वस्तु खरीदते हो तो पैसा चला जाता है और बदले में वो वस्तु तुम्हारे पास रह जाती है ठीक वैसे ही अनुष्ठान करके इसने दर्शन खरीदा ऐसा समझो अब अनुष्ठान की पूंजी नही है केवल सन्त दर्शन, गुरु दर्शन का फल जो भी पुण्य है वो रहेगा।
फिर हमारी तरफ दिखाकर बापूजी बोले कि ये दोनों 4 दिन से रोज मुझसे सुबह शाम सत्संग में मिलते हैं बात भी करते है इनपर मेरी दृष्टि दोनो समय पड़ती है और मैं इनको सुरेश के पास भेजता हूँ वो भी तो संत है उससे भी इनकी 2/3 बार बात हुई उनसे चर्चा करके फिर मेरे पास आते है फिर बात आगे बढ़ती है।
अब देखो इन्होंने कोई अनुष्ठान नही किया है इनको अपने क्षेत्र में सत्संग करवाना है उसी की चर्चा के लिए आते है, रोज दर्शन भी हो रहे है, बात भी होती है क्योंकि ये सेवाधारी हैं, ये सेवा करते है इनका कोई व्यक्तिगत चाह नही है ये लोगों को सत्संग दिलवाने की सेवा कर रहे है अभी जितने दर्शन हुए, बात हुई उसके लिए तो 10/12 अनुष्ठान खर्च हो जाता और इसमे 2 वर्ष लगते
लेकिन इनका कुछ समय नही गया केवल निस्वार्थ सेवा के कारण ही इनको ये सारे लाभ हो रहे हैं इसलिए सबको बोलता हूँ सेवा खोज लो और सेवा करो आपकी साधना अपने आप होती जाएगी।
ये अनुष्ठान वाला तो बोल भी नही पा रहा है और बोलेगा तो इन सेवधरियों की तरह स्वाभाविक बात मुझसे नही कर पायेगा।
कंठ ही नही खुलता है ये ईश्वर की व्यवस्था है अपने लिए करोगे तो विराम लगेगा ही
चाहे आपको दर्शन का स्वार्थ हो
बाकी पुत्र, धन आदि की चाहत से ये दर्शन की इच्छा तो बहुत ऊंची है।
*लेकिन सेवा करने वालो की बराबरी नही हो सकती इसलिए मैं (बापूजी) बार-बार बोलता हूँ। चाहे कुछ भी हो जाए सेवा अवश्य करो ।*
जीवन मे सेवा का कोई व्रत ले लो और उसमें दृढ़ता पूर्वक लग जाओ।
ॐ ॐ ॐ
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