पूज्य बापूजी अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हैं।
एक बार नर्मदा किनारे एक संत मिले। हमने उनसे पूछा, आप बाबा जी कैसे बने, संन्यासी कैसे बने।
संत बोले, मैं एक अहीर का लड़का था। गाय भैंस चराता था। सोचा कि निगुरे होकर क्या रहना, कोई गुरु कर लूँ।
मैं गुरु के पास गया तो उन्होंने कहा, चल रे ग्वाले, तू क्या मंत्र जपेगा, तू क्या साधना करेगा आत्मज्ञान की। मैं तो केवल ब्राह्मण को ही दीक्षा देता हूँ।
मैंने विनती की, बाबा जी, मैं ब्राह्मण का बेटा तो नहीं हूँ लेकिन दया करो।
गुरु बोले, दया करूँगा लेकिन पहले तू गीता का एक श्लोक पक्का याद करके दिखा। मैं भी तो देखूँ कि भक्ति कर सकता है या नहीं।
मैंने गीता का एक श्लोक पक्का किया तो वे बोले, पूरा अध्याय पक्का कर।
मैं पूरा अध्याय पक्का करके गया तो बोले, सारे अध्याय कंठस्थ कर।
मैंने सभी अध्याय कंठस्थ किए, फिर भी उन महाराज का मन नहीं माना। मुझसे कहा, हमारा विचार नहीं हो रहा है तुम्हें दीक्षा देने का।
मैं तो जंगल में आकर बहुत रोया कि क्या मैं इतना अभागा हूँ कि निगुरा पैदा हुआ और निगुरा ही मर जाऊँगा। हे भगवान, मौत आकर मार दे उससे पहले गुरु के ज्ञान से मेरा अहंकार मर जाए। मेरे और परमात्मा के बीच जो पर्दा है वह हट जाए। ऐसी कृपा करने वाले कोई सदगुरु मुझे नहीं मिले, मैं कितना अभागा हूँ।
गुरु ने कहा था कि गीता कंठस्थ करके आ। मैं गीता कंठस्थ करके गया, फिर भी गुरु के मन में मुझे दीक्षा देने का विचार नहीं आया।
रोते रोते मैं बेहोश जैसा हो गया। मुझे तंद्रा आ गई, पता ही नहीं चला। फिर जब मैं उठा तो देखा कि आकाश में पद्मासन लगाए एक दंडी संन्यासी जा रहे थे।
मैं उन्हें देखता ही रहा। बड़ी शांति मिली, बहुत आनंद आया। मन में हुआ, हे भगवान, तेरी लीला अपरंपार है।
वे अलोप हो गए। दूसरे दिन मैं नाश्ता करके घर से बाहर निकला। गायें आगे थीं और मैं पीछे।
तभी अचानक वही संन्यासी मेरे सामने आए और बोले, तुझे गुरु करना है न, चल मैं तेरा गुरु हूँ।
वे मुझे जंगल में ले गए। फिर मंत्रदीक्षा देकर अदृश्य हो गए।
अब मैं नर्मदा किनारे गुरुमंत्र का अनुष्ठान करता हूँ और साधना करता हूँ।
ईश्वर की सृष्टि की व्यवस्था बड़ी अद्भुत है। जब साधक की ईश्वरप्राप्ति की तीव्र उत्कंठा होती है तो उसे अदृश्य रूप से विचरण करने वाले सदगुरु के द्वारा भी मंत्रदीक्षा मिल जाती है।
सचमुच वे लोग महाधनभागी हैं जिनको सदगुरु रूप में कोई जागृत महापुरुष, कोई अहैतुकी करुणावान ब्रह्मज्ञानी संत मिल गए हैं और जिनको ऐसे महापुरुषों से सहज ही भगवन्नाम की दीक्षा मिल गई है।
जय सदगुरुदेव।