Tuesday, 17 February 2026

ईश्वरप्राप्ति की तीव्र उत्कंठा होनी चाहिए





 पूज्य बापूजी अपने जीवन का एक प्रसंग बताते हैं।

एक बार नर्मदा किनारे एक संत मिले। हमने उनसे पूछा, आप बाबा जी कैसे बने, संन्यासी कैसे बने।

संत बोले, मैं एक अहीर का लड़का था। गाय भैंस चराता था। सोचा कि निगुरे होकर क्या रहना, कोई गुरु कर लूँ।

मैं गुरु के पास गया तो उन्होंने कहा, चल रे ग्वाले, तू क्या मंत्र जपेगा, तू क्या साधना करेगा आत्मज्ञान की। मैं तो केवल ब्राह्मण को ही दीक्षा देता हूँ।

मैंने विनती की, बाबा जी, मैं ब्राह्मण का बेटा तो नहीं हूँ लेकिन दया करो।

गुरु बोले, दया करूँगा लेकिन पहले तू गीता का एक श्लोक पक्का याद करके दिखा। मैं भी तो देखूँ कि भक्ति कर सकता है या नहीं।

मैंने गीता का एक श्लोक पक्का किया तो वे बोले, पूरा अध्याय पक्का कर।

मैं पूरा अध्याय पक्का करके गया तो बोले, सारे अध्याय कंठस्थ कर।

मैंने सभी अध्याय कंठस्थ किए, फिर भी उन महाराज का मन नहीं माना। मुझसे कहा, हमारा विचार नहीं हो रहा है तुम्हें दीक्षा देने का।

मैं तो जंगल में आकर बहुत रोया कि क्या मैं इतना अभागा हूँ कि निगुरा पैदा हुआ और निगुरा ही मर जाऊँगा। हे भगवान, मौत आकर मार दे उससे पहले गुरु के ज्ञान से मेरा अहंकार मर जाए। मेरे और परमात्मा के बीच जो पर्दा है वह हट जाए। ऐसी कृपा करने वाले कोई सदगुरु मुझे नहीं मिले, मैं कितना अभागा हूँ।

गुरु ने कहा था कि गीता कंठस्थ करके आ। मैं गीता कंठस्थ करके गया, फिर भी गुरु के मन में मुझे दीक्षा देने का विचार नहीं आया।

रोते रोते मैं बेहोश जैसा हो गया। मुझे तंद्रा आ गई, पता ही नहीं चला। फिर जब मैं उठा तो देखा कि आकाश में पद्मासन लगाए एक दंडी संन्यासी जा रहे थे।

मैं उन्हें देखता ही रहा। बड़ी शांति मिली, बहुत आनंद आया। मन में हुआ, हे भगवान, तेरी लीला अपरंपार है।

वे अलोप हो गए। दूसरे दिन मैं नाश्ता करके घर से बाहर निकला। गायें आगे थीं और मैं पीछे।

तभी अचानक वही संन्यासी मेरे सामने आए और बोले, तुझे गुरु करना है न, चल मैं तेरा गुरु हूँ।

वे मुझे जंगल में ले गए। फिर मंत्रदीक्षा देकर अदृश्य हो गए।

अब मैं नर्मदा किनारे गुरुमंत्र का अनुष्ठान करता हूँ और साधना करता हूँ।

ईश्वर की सृष्टि की व्यवस्था बड़ी अद्भुत है। जब साधक की ईश्वरप्राप्ति की तीव्र उत्कंठा होती है तो उसे अदृश्य रूप से विचरण करने वाले सदगुरु के द्वारा भी मंत्रदीक्षा मिल जाती है।

सचमुच वे लोग महाधनभागी हैं जिनको सदगुरु रूप में कोई जागृत महापुरुष, कोई अहैतुकी करुणावान ब्रह्मज्ञानी संत मिल गए हैं और जिनको ऐसे महापुरुषों से सहज ही भगवन्नाम की दीक्षा मिल गई है।

जय सदगुरुदेव।





बापूजी ही शिव

  



   एक गुप्त प्रसंग जो अब छुपा नहीं सकते। 

    यह प्रसंग कुछ साल पहले का है। गुजरात में सूरत शहर में पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी के आश्रम में एक शिव मंदिर है। सूरत शहर में एकांत शिव मंदिर मिलना दुर्लभ है। वह मंदिर शहर के एक साइड में एकांत स्थान पर स्थित है।

    उस शिव मंदिर में शहर का एक व्यक्ति, जो गुरुजी का शिष्य नहीं था, रोज आश्रम में बने शिव मंदिर में शिवलिंग को जल अर्पण करने आता था और अपनी योग्यता अनुसार पूजा आराधना करता था। उस शिव मंदिर में कुछ आश्रमवासी जप और ध्यान भी करते रहते थे।

    कुछ ही दिन बाद, जब उस व्यक्ति ने भाव सहित जल अर्पण और पूजा की, तब वहां उपस्थित एक आश्रमवासी के मोबाइल पर एक फोन आया और कहा गया कि पास में खड़े व्यक्ति को फोन दो। उस आश्रमवासी ने समझदारी से फोन उस व्यक्ति को दे दिया और कहा कि आपकी कॉल आई है, बात कीजिए।

    जब उस व्यक्ति ने फोन लेकर हेलो कहा, तो आवाज आई कि बोल, क्यों मुझे याद कर रहा है। मैं तेरी पूजा से प्रसन्न हूं। बोल, क्यों याद कर रहा है। मैं ही शिव हूं। ऐसे कुछ शब्द उस व्यक्ति ने बताए।

    उस व्यक्ति ने भावुकता और श्रद्धा से बातचीत की और अपनी प्रार्थना शिव भगवान के समक्ष रखी।

    वह कॉल किसका था? वह थे हमारे प्यारे गुरुजी संत श्री आशारामजी बापूजी।

    फिर दुबारा भी ऐसा हुआ कि वह व्यक्ति पूजा आराधना करके मंदिर से जा रहा था और आश्रम के गेट पर पहुंचा। तुरंत वहां बने कार्यालय में संचालक महोदय श्री रूपा भाई के मोबाइल पर कॉल आया और गुरुजी ने कहा कि आश्रम गेट पर एक व्यक्ति है, उससे मेरी बात करवाओ। तुरंत उन्होंने गेट पर रोककर उनकी बात करवाई। महादेव ने, बापूजी ने, गुरुजी ने उस व्यक्ति से बातचीत की।

    पूज्य बापूजी ही शिव भगवान हैं। यह कोई भावना की बात नहीं है। यही सत्य है कि शिवजी ही पूज्य बापूजी बनकर आए हैं। पूज्य बापूजी ही भगवान शिव हैं। विश्वास करो, श्रद्धा करो और उनकी दी हुई कुंजियों से मुक्ति को प्राप्त करो।

    ॐ ॐ मेरे पूज्य बापूजी की महा महा जय जयकार हो।

    ॐ शिव ॐ। ॐ गुरु ॐ।