जिसको सच्चे संत और गुरु मिल गए, वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता, भूत, भविष्य और वर्तमान सबको भगवत भाव की चासनी में मुरब्बा बना देता है। आप भी अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय और चिंता का मुरब्बा बना लो। एक तो उसमें भगवत रस की चासनी डाल दो और दूसरी जो भी परिस्थितियाँ आएँ, उस प्रकार के मसाले डाल दो।
अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश ये प्राणियों के अनेक प्रकार के भाव भगवान से ही प्रकाशित होते हैं। ऐसा भगवान कहते हैं। तो महाराज, ये सब आपसे ही प्रकाशित होते हैं, तो ये सब आपकी ही लीला है। इस प्रकार की समझ की चासनी डाल दो। भगवान ने जो कहा है, वही हम स्वीकार कर रहे हैं। हम कोई नया मुरब्बा नहीं बना रहे। हमारी कमियाँ जो भी हों, वे नमक की तरह हैं, पर मुरब्बे में स्वाद ले आती हैं। मिर्ची तीखी है, पर मुरब्बे में स्वादिष्ट हो जाती है। दालचीनी अकेली परेशान कर सकती है, पर मुरब्बे में रंग और सुगंध ले आती है।
वेद में बहुत ऊँची बात कही गई है। वेद भगवान कहते हैं, हे मनुष्य, तू अपने दिल को भगवान के भाव से, भगवान के प्रेम से भर दे। प्रभु, हम तेरे हैं और तू हमारा है। बस ऐसा कहकर तू अपना जीवन जीवनदाता के साथ एकतान कर दे। काम, क्रोध, मद, मत्सर, भय, रोग और चिंता ऐसे लोफर हैं जो आते हैं और तुम्हें मारपीट कर चले जाते हैं। क्रोध आता है और तपा कर चला जाता है। काम आता है और नोच कर चला जाता है। मोह आता है और फिसला कर चला जाता है। अहंकार आता है और उद्विग्न कर चला जाता है।
तुम बस प्रभु प्रीति की चासनी तैयार रखो। जो भी आए, उसे उस चासनी में डुबाते जाओ। सब मुरब्बा बनता जाएगा। प्रभु भाव से मन को भर दो। प्रभु ज्ञान से मन को भर दो। प्रभु के साथ तुम्हारा अपनत्व था, अपनत्व है और अपनत्व ही रहेगा। तुम यह नहीं मानते तो दुख है, और मान लिया तो उसी समय मधुरता आ जाती है।
वेद कहते हैं कि प्रभु हम आपके हैं और आप हमारे हैं, यह स्मृति बनी रहे। भयानक दृश्य हों, करुण प्रसंग हों, भयानक या हास्य या शृंगार, सबमें भगवान की स्मृति का रस डाल दो। जैसे फिल्म में सभी प्रकार के प्रसंग होते हैं, हास्य भी होता है, रौद्र भी होता है, करुण और शृंगार भी होता है। एक ही प्रकार का रस होगा तो आनंद नहीं आएगा। ऐसे ही इस दुनिया को भगवान ने तुम्हारी उन्नति के लिए रचा है। वाह प्रभु।
ऋग्वेद का भय और भयानक रस तथा सामवेद का संगीत, शृंगार और अद्भुत रस, ये सब तुम्हारी लीला है। इसलिए ऐसा कभी मत मानो कि भगवान कोई खेती है कि अभी भजन करें और बाद में फल मिलेगा। नहीं, अभी के अभी, इसी समय फल मिलता है। जो ऐसा सोचते हैं कि भगवान को पाने के लिए हम अयोग्य हैं, वे अपनी अयोग्यता बढ़ाते हैं। हर परिस्थिति में भगवान के ज्ञान और भगवान की प्रीति का मसाला डालकर मुरब्बा बना दो, बस।