Tuesday, 15 August 2023

अनोखा मुरब्बा


     जिसको सच्चे संत और गुरु मिल गए, वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता, भूत, भविष्य और वर्तमान सबको भगवत भाव की चासनी में मुरब्बा बना देता है। आप भी अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय और चिंता का मुरब्बा बना लो। एक तो उसमें भगवत रस की चासनी डाल दो और दूसरी जो भी परिस्थितियाँ आएँ, उस प्रकार के मसाले डाल दो।

    अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश ये प्राणियों के अनेक प्रकार के भाव भगवान से ही प्रकाशित होते हैं। ऐसा भगवान कहते हैं। तो महाराज, ये सब आपसे ही प्रकाशित होते हैं, तो ये सब आपकी ही लीला है। इस प्रकार की समझ की चासनी डाल दो। भगवान ने जो कहा है, वही हम स्वीकार कर रहे हैं। हम कोई नया मुरब्बा नहीं बना रहे। हमारी कमियाँ जो भी हों, वे नमक की तरह हैं, पर मुरब्बे में स्वाद ले आती हैं। मिर्ची तीखी है, पर मुरब्बे में स्वादिष्ट हो जाती है। दालचीनी अकेली परेशान कर सकती है, पर मुरब्बे में रंग और सुगंध ले आती है।

    वेद में बहुत ऊँची बात कही गई है। वेद भगवान कहते हैं, हे मनुष्य, तू अपने दिल को भगवान के भाव से, भगवान के प्रेम से भर दे। प्रभु, हम तेरे हैं और तू हमारा है। बस ऐसा कहकर तू अपना जीवन जीवनदाता के साथ एकतान कर दे। काम, क्रोध, मद, मत्सर, भय, रोग और चिंता ऐसे लोफर हैं जो आते हैं और तुम्हें मारपीट कर चले जाते हैं। क्रोध आता है और तपा कर चला जाता है। काम आता है और नोच कर चला जाता है। मोह आता है और फिसला कर चला जाता है। अहंकार आता है और उद्विग्न कर चला जाता है।

    तुम बस प्रभु प्रीति की चासनी तैयार रखो। जो भी आए, उसे उस चासनी में डुबाते जाओ। सब मुरब्बा बनता जाएगा। प्रभु भाव से मन को भर दो। प्रभु ज्ञान से मन को भर दो। प्रभु के साथ तुम्हारा अपनत्व था, अपनत्व है और अपनत्व ही रहेगा। तुम यह नहीं मानते तो दुख है, और मान लिया तो उसी समय मधुरता आ जाती है।

    वेद कहते हैं कि प्रभु हम आपके हैं और आप हमारे हैं, यह स्मृति बनी रहे। भयानक दृश्य हों, करुण प्रसंग हों, भयानक या हास्य या शृंगार, सबमें भगवान की स्मृति का रस डाल दो। जैसे फिल्म में सभी प्रकार के प्रसंग होते हैं, हास्य भी होता है, रौद्र भी होता है, करुण और शृंगार भी होता है। एक ही प्रकार का रस होगा तो आनंद नहीं आएगा। ऐसे ही इस दुनिया को भगवान ने तुम्हारी उन्नति के लिए रचा है। वाह प्रभु।

    ऋग्वेद का भय और भयानक रस तथा सामवेद का संगीत, शृंगार और अद्भुत रस, ये सब तुम्हारी लीला है। इसलिए ऐसा कभी मत मानो कि भगवान कोई खेती है कि अभी भजन करें और बाद में फल मिलेगा। नहीं, अभी के अभी, इसी समय फल मिलता है। जो ऐसा सोचते हैं कि भगवान को पाने के लिए हम अयोग्य हैं, वे अपनी अयोग्यता बढ़ाते हैं। हर परिस्थिति में भगवान के ज्ञान और भगवान की प्रीति का मसाला डालकर मुरब्बा बना दो, बस।





मनोकामना पूर्ति मंत्र व सेवा की महिमा

ये घटना सितम्बर 2003 के नाशिक कुम्भ मेला के समय की है, हमारी समिति के तरफ से हम श्री सुरेशानंद जी का सत्संग मांगने बापूजी के पास पहुँचे, गुरुजी सत्संग की अनुमति प्रदान करते हुए बोले कि आगे की चर्चा सुरेश से मिलकर करलो।
सत्संग प्रोग्राम की व्यवस्था फाइनल करने के लिए लगभग हमारी बात रोज बापूजी एवं श्रीसुरेशानंद जी से अलग अलग 3/4 दिनों तक होती रही और अंत में बापूजी की मुहर लगनी थी इसके लिए हम बापूजी से मिलने नाशिक आश्रम रात को करीब 10 बजे पहुंचे, गुरुजी सांयकालीन भ्रमण के लिए निकले थे।
हमने देखा कि बापूजी से मिलने के लिए कुछ 15/17 साधक भाई बहन आश्रम के गेट पर ही प्रतीक्षा में खड़े हैं, तो हम भी वहीं खड़े हो गए।
थोड़ी देर में बापूजी आए एवं टॉर्च जलाकर सबके चेहरे पर देखे और सबका समाचार/कुशलता पूछने लगे। तभी एक भाई ने बताया कि बापूजी 3/4 महीने पहले ऋषि प्रसाद में मनोकामना पूर्ति का मंत्र छपा था।
बापूजी बोले कि "हाँ छपा था मैंने ही छपवाया था उसका अनुष्ठान करो अगर कोई मनोकामना होगी तो पूर्ण होगी।"
वो भाई बोले कि बापूजी मैने उसका अनुष्ठान किया।
बापूजी बोले "क्या हुआ ? मनोकामना पूर्ण हुई?"

वो भाई बोले जी गुरुदेव पूरी हो गई।

इस पर बापूजी पूछे कि मनोकामना क्या थी बताओ

तो वे भाई रोते हुए बोले कि मैंने कई वर्षों से काफी प्रयास किया कि गुरुजी का दर्शन अच्छे से नजदीक से हो, पर कभी नही हुआ। कई बार अहमदाबाद और सूरत के शिविरों में गया और भी कई जगह गया लेकिन मुझे कहीं भी नजदीक से बढ़िया दर्शन नही हुआ। इसलिए ऋषि प्रसाद में मन्त्र देखा तो अनुष्ठान किया और आज इतना बढ़िया दर्शन हुए।
इतना सुनते ही बापूजी ने टॉर्च की रोशनी अपने स्वयं की ओर करके विनोदी अंदाज़ में बोले कि ले और अच्छे से जी भर के दर्शन कर ले।
वो भाई इतने भावुक हो गए कि खड़े नही रह पाए वहीं भूमि पर बैठकर रोने लगे और गुरुदेव बोले कि मैं यही हूँ तुम शान्ति से रो लो मन हल्का हो जाएगा।

उसके बाद बापूजी वहाँ खड़े सबसे बोले कि देखो इसने अनुष्ठान किया उसका फल इसे मिल गया, दर्शन की इच्छा थी पूरी हो गई, अब अनुष्ठान की जो कमाई थी वो खत्म हो गई उसका फल दर्शन मिलने से
अब इसके पास दर्शन का पुण्य रहेगा।
बापूजी ने स्पष्ट समझाए की आप पैसा कमाते हो उस कमाई से कोई वस्तु खरीदते हो तो पैसा चला जाता है और बदले में वो वस्तु तुम्हारे पास रह जाती है ठीक वैसे ही अनुष्ठान करके इसने दर्शन खरीदा ऐसा समझो अब अनुष्ठान की पूंजी नही है केवल सन्त दर्शन, गुरु दर्शन का फल जो भी पुण्य है वो रहेगा।
फिर हमारी तरफ दिखाकर बापूजी बोले कि ये दोनों 4 दिन से रोज मुझसे सुबह शाम सत्संग में मिलते हैं बात भी करते है इनपर मेरी दृष्टि दोनो समय पड़ती है और मैं इनको सुरेश के पास भेजता हूँ वो भी तो संत है उससे भी इनकी 2/3 बार बात हुई उनसे चर्चा करके फिर मेरे पास आते है फिर बात आगे बढ़ती है।
अब देखो इन्होंने कोई अनुष्ठान नही किया है इनको अपने क्षेत्र में सत्संग करवाना है उसी की चर्चा के लिए आते है, रोज दर्शन भी हो रहे है, बात भी होती है क्योंकि ये सेवाधारी हैं, ये सेवा करते है इनका कोई व्यक्तिगत चाह नही है ये लोगों को सत्संग दिलवाने की सेवा कर रहे है अभी जितने दर्शन हुए, बात हुई उसके लिए तो 10/12 अनुष्ठान खर्च हो जाता और इसमे 2 वर्ष लगते
लेकिन इनका कुछ समय नही गया केवल निस्वार्थ सेवा के कारण ही इनको ये सारे लाभ हो रहे हैं इसलिए सबको बोलता हूँ सेवा खोज लो और सेवा करो आपकी साधना अपने आप होती जाएगी।
ये अनुष्ठान वाला तो बोल भी नही पा रहा है और बोलेगा तो इन सेवधरियों की तरह स्वाभाविक बात मुझसे नही कर पायेगा।
कंठ ही नही खुलता है ये ईश्वर की व्यवस्था है अपने लिए करोगे तो विराम लगेगा ही
चाहे आपको दर्शन का स्वार्थ हो
बाकी पुत्र, धन आदि की चाहत से ये दर्शन की इच्छा तो बहुत ऊंची है।
*लेकिन सेवा करने वालो की बराबरी नही हो सकती इसलिए मैं (बापूजी) बार-बार बोलता हूँ। चाहे कुछ भी हो जाए सेवा अवश्य करो ।*
जीवन मे सेवा का कोई व्रत ले लो और उसमें दृढ़ता पूर्वक लग जाओ।

ॐ ॐ ॐ