एक गुप्त प्रसंग जो अब छुपा नहीं सकते।
यह प्रसंग कुछ साल पहले का है। गुजरात में सूरत शहर में पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी के आश्रम में एक शिव मंदिर है। सूरत शहर में एकांत शिव मंदिर मिलना दुर्लभ है। वह मंदिर शहर के एक साइड में एकांत स्थान पर स्थित है।
उस शिव मंदिर में शहर का एक व्यक्ति, जो गुरुजी का शिष्य नहीं था, रोज आश्रम में बने शिव मंदिर में शिवलिंग को जल अर्पण करने आता था और अपनी योग्यता अनुसार पूजा आराधना करता था। उस शिव मंदिर में कुछ आश्रमवासी जप और ध्यान भी करते रहते थे।
कुछ ही दिन बाद, जब उस व्यक्ति ने भाव सहित जल अर्पण और पूजा की, तब वहां उपस्थित एक आश्रमवासी के मोबाइल पर एक फोन आया और कहा गया कि पास में खड़े व्यक्ति को फोन दो। उस आश्रमवासी ने समझदारी से फोन उस व्यक्ति को दे दिया और कहा कि आपकी कॉल आई है, बात कीजिए।
जब उस व्यक्ति ने फोन लेकर हेलो कहा, तो आवाज आई कि बोल, क्यों मुझे याद कर रहा है। मैं तेरी पूजा से प्रसन्न हूं। बोल, क्यों याद कर रहा है। मैं ही शिव हूं। ऐसे कुछ शब्द उस व्यक्ति ने बताए।
उस व्यक्ति ने भावुकता और श्रद्धा से बातचीत की और अपनी प्रार्थना शिव भगवान के समक्ष रखी।
वह कॉल किसका था? वह थे हमारे प्यारे गुरुजी संत श्री आशारामजी बापूजी।
फिर दुबारा भी ऐसा हुआ कि वह व्यक्ति पूजा आराधना करके मंदिर से जा रहा था और आश्रम के गेट पर पहुंचा। तुरंत वहां बने कार्यालय में संचालक महोदय श्री रूपा भाई के मोबाइल पर कॉल आया और गुरुजी ने कहा कि आश्रम गेट पर एक व्यक्ति है, उससे मेरी बात करवाओ। तुरंत उन्होंने गेट पर रोककर उनकी बात करवाई। महादेव ने, बापूजी ने, गुरुजी ने उस व्यक्ति से बातचीत की।
पूज्य बापूजी ही शिव भगवान हैं। यह कोई भावना की बात नहीं है। यही सत्य है कि शिवजी ही पूज्य बापूजी बनकर आए हैं। पूज्य बापूजी ही भगवान शिव हैं। विश्वास करो, श्रद्धा करो और उनकी दी हुई कुंजियों से मुक्ति को प्राप्त करो।
ॐ ॐ मेरे पूज्य बापूजी की महा महा जय जयकार हो।
ॐ शिव ॐ। ॐ गुरु ॐ।
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